स्वभाव एवं विशेषण
द्वितीया। द्वितीया (मंगल प्रदा: शुभता प्रदान करने वाली)। अधिदेवता: मुहूर्त चिंतामणि के अनुसार ब्रह्मा (सृष्टि के देवता - हिंदू त्रिदेव में से एक)। एक अन्य मत: शुक्ल पक्ष में कुबेर, कृष्ण पक्ष में विष्णु। बृहत् संहिता में विधाता (स्रष्टा) बताया गया है।
अनुमत कार्य
विवाह, उपनयन, देव प्रतिष्ठा (देवता की मूर्ति स्थापना), समस्त पौष्टिक (विकासात्मक) एवं मांगलिक (शुभ) कार्य, व्रत आरंभ एवं समाप्ति, गृह, शासकीय कार्य, कोष, सेना, यात्रा, संगीत, कला, मूर्तिकला, अलंकार (आभूषण, सजावट), आभूषण निर्माण एवं धारण। द्वितीया तिथि हेतु नियत कार्य सप्तमी, दशमी एवं त्रयोदशी तिथियों में भी फलित होते हैं।
निषिद्ध कार्य एवं भोजन
द्वितीया को लवण / परवल / भटकटैया (बृहती फल / कटेरी / बिजौरा) नहीं खाना चाहिए। द्वितीया तिथि को शरीर पर उबटन (मुख्यतः नीम से बना लेप) नहीं लगाना चाहिए (द्वितीया को उबटन स्नान धन एवं पुत्र दोनों का नाश करता है)। द्वितीया तिथि को आंवला स्नान नहीं करना चाहिए।
वर्गीकरण एवं विशेषताएं
- नंदादि समूह
- भद्रा तिथि (स्वामी: बुध)। शुक्ल पक्ष नाम: उग्र कर्मा; कृष्ण पक्ष नाम: बाला एवं खला।
- नेत्र स्थिति
- शुक्ल पक्ष में अंधी तिथि; कृष्ण पक्ष में दो-नेत्र तिथि।
- कुल समूह
- कुलाकुल तिथि।
- अमृत-घटी
- 56वीं से 59वीं घटी (आरंभ से 22घं 00मि से 23घं 36मि; चंद्र-सूर्य कोणीय अंतर: 23°00'00" से 23°48'00")।
- विष-घटी
- 6ठी से 9वीं घटी (आरंभ से 2घं 00मि से 3घं 36मि; चंद्र-सूर्य कोणीय अंतर: 13°00'00" से 13°48'00")।
- निषिद्ध अवधि
- 29वीं घटी पर तिथि कूपम्।
- मास शून्य
- आश्विन (शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष) तथा कार्तिक (शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष)।
- दग्ध तिथि
- सूर्य धनु राशि में (शुक्ल पक्ष), मीन राशि में (कृष्ण पक्ष), तुला राशि में (कृष्ण पक्ष), मकर राशि में (शुक्ल पक्ष)। ज्ञानमंजरी: पौष, चैत्र।
- वार दग्ध
- बुधवार (ऋषि बृहस्पति), शुक्रवार (दैवज्ञ रामदीन)।
- तिथि-शून्य नक्षत्र
- अनुराधा।
- तिथि-शून्य लग्न
- धनु, मीन (अथवा मेष)।
- अशुभ लग्न
- धनु, मीन।
- घात तिथियां
- मिथुन एवं कर्क जन्म राशियों के लिए घात। वृषभ राशि के लिए अशुभ।
- विशेष योग
- बुधवार (सिद्ध/अमृत/रत्नाकुर योग), सोमवार/मंगलवार (मृत्यु योग), मंगलवार (दग्ध योग), रविवार (विष योग), मंगलवार (हुताशन योग), शुक्रवार (कुलिक योग)।
- दिशा शूल एवं योगिनी
- दिक् शूल: उत्तर; योगिनी: उत्तर।
शांति एवं दान
स्वर्ण में अग्नि देव की मूर्ति बनाएं, गुड़, घी एवं तांबे के पत्ते रखें; जल एवं तिल से भरा कलश रखकर पूजा करें।